हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ/ आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली हुसैनी सीस्तानी (द) के प्रतिनिधि कार्यालय में जारी अशरा-ए-मजलिस की छठी मजलिस का आरंभ मौलाना क़मरुल हसन ज़ैनबी ने क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत और ज़ियारत-ए-आशूरा से किया। इस अवसर पर डॉक्टर सय्यद मुहम्मद अब्बास वाएज़ ने अहलेबैत (अ) की बारगाह में मनक़बत पेश की।
मजलिस से संबोधित करते हुए मरजअ-ए-आला आयतुल्लाह सय्यद अली हुसैनी सीस्तानी (दा) के प्रतिनिधि हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद अशरफ़ अली अल-ग़रवी ने कहा कि अल्लाह तआला ने दीन की तबलीग़ के लिए हिकमत और अच्छी नसीहत के साथ दावत देने का आदेश दिया है। यदि इस क़ुरआनी शिक्षण को अपनाया जाए तो समाज में मतभेद और झगड़ों की गुंजाइश नहीं रहती।

मौलाना सय्यद अशरफ़ अली अल-ग़रवी ने प्रसिद्ध रिवायत “हम वही नुक्ता हैं जो बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम के ‘बा’ के नीचे है” का उल्लेख करते हुए कहा कि आज विज्ञान और तकनीक के युग में एक बहुत छोटी चीज़ में हज़ारों-लाखों किताबों का डेटा सुरक्षित किया जा सकता है। जब इंसान की बनाई हुई चीज़ों में इतनी क्षमता है, तो अल्लाह की रचना में इससे कहीं अधिक विस्तार, गहराई और रहस्य होना स्वाभाविक है।
उन्होंने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) की एक रिवायत का हवाला देते हुए कहा कि यद्यपि इमाम सज्जाद (अ) को “ज़ैनुल आबेदीन” कहा जाता है, लेकिन स्वयं इमाम (अ) ने सर्वोच्च इबादत, तक़वा और बंदगी के उदाहरण के रूप में हज़रत अली (अ) को पेश किया है। उन्होंने आगे कहा कि अमीरुल मोमेनीन (अ) ने अपनी आध्यात्मिक और शैक्षिक परंपरा का स्रोत रसूलुल्लाह (स) को बताया है।
उन्होंने एक रिवायत बयान करते हुए कहा कि जब यमन से शहद आया, तो हज़रत अली (अ) ने अपने हाथों से कूफ़ा के यतीम बच्चों को शहद खिलाया।
मौलाना सय्यद अशरफ़ अली अल-ग़रवी ने कहा कि रसूलुल्लाह (स) का फ़रमान है कि “दीन अल्लाह की इताअत और मख़लूक़ के साथ रहमत का नाम है” और हज़रत अली (अ) ने अपनी ज़िंदगी में इसका बेहतरीन नमूना पेश किया।
अपने संबोधन में उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इंसान की दीनी पहचान केवल इबादतों से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक व्यवहार से भी होती है। रिवायतों के अनुसार उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के किरदार, ईमानदारी और अख़लाक़ को सफ़र, क़र्ज़, अमानत और राज़दारी जैसे मामलों से बेहतर समझा जा सकता है।
मौलाना ने फ़िक्र व तदब्बुर की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इंसान का दर्जा उसकी सोच से पहचाना जाता है। उन्होंने रिवायत का हवाला दिया कि “एक घंटे का विचार सत्तर साल की इबादत से बेहतर है” और लोगों को ऊँची सोच और गहरी फ़िक्र अपनाने की प्रेरणा दी।

इख़लास की अहमियत बताते हुए उन्होंने कहा कि हर अमल में नीयत का सच्चा होना बुनियादी महत्व रखता है। उन्होंने वाक़या-ए-कर्बला का उल्लेख करते हुए कहा कि इमाम हुसैन (अ) के साथी, जवान, बुज़ुर्ग और यहाँ तक कि बच्चे भी दुनिया को इख़लास, वफ़ादारी और क़ुर्बानी का ऐसा अमर संदेश दे गए हैं जो हमेशा मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।
मजलिस के अंत में मौलाना शब्बीर अली ने दर्दभरे नौहे पढ़े और अज़ादारों ने सीना-ज़नी करके इमाम हुसैन (अ) और शोहदाए कर्बला को श्रद्धांजलि अर्पित की।
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